मधुरेंद्र पाण्डे



हमने भी कश्तियों को तूफां में उतारा है,

ऐ मौज समंदर का सीना भी हमारी है।


क्या ख़ाक लुत्फ लेंगे साहिल के तमाशाई,

जिसने हर इक लम्हा, डर डर के गुज़ारा है।


देखेंगे आज हम भी तेवर तलातुम के,

कह देंगे बाज़ुओं में ये ज़ोर हमारा है।


अब क्या कहेंगे बातें, तुमसे 'मधुर' बताएं,

जब दर्द बढ़ चला है, टूटा ये किनारा है।
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