मधुरेंद्र पाण्डे


जब भी उदासियों के बियाबान में रहे,

हरदम तुम्हारी याद के जुगनू भी संग रहे।


लम्होें के टूटने की सदा कुछ ना कर सकी,

हम तो फकत उम्मीद के पहलू में ही रहे।


तुमने तो दर्द ख़्वाब में महसूस भर किया,

हम तो उसी के आशियां में उम्र भर रहे।


कैसे कोई सुनाता 'मधुर' की कोई ग़ज़ल,

जो लोग साथ थे उसी में डूब कर रहे।
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