मधुरेंद्र पाण्डे



वो एक शब्द 

जो मेरे-तुम्हारे बीच

बहुत तन्हा है

आज उस शब्द को

आकाश की चादर दे दो

दे दो गहराई

एक शांत समंदर जैसी

दे दो देना हो तो

इस रिश्ते को

अब नाम कोई

बहुत चुभता है

कहीं दिल के किसी कोने में

वो शब्द

जो मेरे-तुम्हारे बीच

बहुत तन्हा है
मधुरेंद्र पाण्डे


जब भी उदासियों के बियाबान में रहे,

हरदम तुम्हारी याद के जुगनू भी संग रहे।


लम्होें के टूटने की सदा कुछ ना कर सकी,

हम तो फकत उम्मीद के पहलू में ही रहे।


तुमने तो दर्द ख़्वाब में महसूस भर किया,

हम तो उसी के आशियां में उम्र भर रहे।


कैसे कोई सुनाता 'मधुर' की कोई ग़ज़ल,

जो लोग साथ थे उसी में डूब कर रहे।
मधुरेंद्र पाण्डे


अंखियन देखी बात कहूं मैं,

दुख में सुख का भार सहूं मैं,

मेरी परिणित सिर्फ यही है,

दो पाटन के बीच रहूूं मैं।


आंसू की ज्वाला उकसाती,

भेद सभी चेहरे पर लाती, 

ये मेरे अंतर की पीड़ा,

विष दंतों सी मुझे सताती।


इसकी नियति तोड़ चला हूं,

पीड़ा में मुस्कान बहूं मैं।


अंखियन देखी बात कहूं मैं,

दुख में सुख का भार सहूं मैं।


दीपक बिन आंगन है सूना,

जैसे आंसू का ख़त छूना,

शेष रह गई मेरी पीड़ा, 

हृदय का आवास नमूना।


प्रिय तेरे आहट में खोकर,

अंदर-अंदर रोज़ ढ़हूं मैं।


अंखियन देखी बात कहूं मैं,

दुख में सुख का भार सहूं मैं।


मैं रो कर भी रो ना पाया,

खुद को खो कर खो ना पाया,

ये मेला भी अजब तमाशा, 

मैं गा कर भी गा ना पाया।


बस तेरी सांसों के सुर में,

सारे अपने गीत कहूं मैं।


अंखियन देखी बात कहूं मैं,

दुख में सुख का भार सहूं मैं।


तेरी मेरी सांसे थोड़ी,

दुनिया समझे नहीं निगोड़ी, 

खर्च यहीं सब हो जानी हैं,

सांसे भी कब किसने जोड़ी।


फिर भी तृष्णा बहुत बड़ी है,

मृग तृष्णा के बीच बहूं मैं।
मधुरेंद्र पाण्डे


टुकड़ों में नीलाम हो गया मेरा जीवन,

अपना था गुमनाम हो गया मेरा जीवन।


इसकी निधियां संचित कर पलकों पर रखीं,

स्मृति को बेकाम कर गया मेरा जीवन।


मुझको जब भी मिला दे गया ताप अनूठा,

माघ-पूस का घाम हो गया मेरा जीवन।


ना जानें क्यों रह रह कर समझाता जाता,

मास्साब की डांट हो गया मेरा जीवन।


जब भी रजत रश्मियों से मिलकर  के आता,

बिन देवों का धाम हो गया मेरा जीवन।
मधुरेंद्र पाण्डे


मेरी बातें ख़्वाब नहीं हैं,

हर झुकना आदाब नहीं है,

अपनी तो आदत है कोशिश,

हार कभी भी मात नहीं है।
मधुरेंद्र पाण्डे

'मधुर' का जीना अगर तुमको बुरा लगता खुदा,

छीन लेता ज़िंदगी, क्यों बांह कर दी यूं जुदा,

वो मेरा साया नहीं था, जिस्म की धड़कन था वो,

ज़िंदगी की राह में बस एक ही था हमज़ुबां।
मधुरेंद्र पाण्डे


मुझको यह विश्वास नहीं है।

तुमको मेरी आस नहीं है।


मेरे गीत कहेंगे सब कुछ,

यद्यपि उनमें सांस नहीं है।


सुधियों ने जो गीत रचाया,

आंसू का उपहास नहीं है।


कलियों की मुस्कान है गायब,

ये कोई मधुमास नहीं है।


आंसू में पीड़ा जब घोलूं,

कैसे कह दूं प्यास नहीं है।


हर कल्पना अधूरी सी है,

जब तक प्रियतम पास नहीं है।


विरह वेदना क्यों कम होगी,

ये कोई परिहास नहीं है।


'मधुर' तुम्हारी बात हमेशा,

हृदय का संत्रास नहीं है।
मधुरेंद्र पाण्डे


जब तलक ज़िंदगी नहीं जी थी,

मुझको मालूम ना था क्या शै है,

आज दो पल को ज़िंदगी जी ली,

खुद से लड़ करके थक गया हूं मैं। 
मधुरेंद्र पाण्डे


आंख से अश्कों की बातें पूछिएगा एक दिन,

रास्ते के दर्द को पहचानिएगा एक दिन।


मैं नज़र आ जाऊंगा चुपके से ख़्वाबों की तरह,

शाम को सूरज की किरणें देखिएगा एक दिन।


खो रहा हूं आज सब कुछ सोचकर कुछ इस तरह,

कह रहा हूं खुद से सब कुछ पाइयेगा एक दिन।


पाएंगे मंज़िल सभी लेकिन ज़रा कुछ देर से,

रफ्ता-रफ्ता लुत्फ-ए-हसरत देखिएगा एक दिन।


'मधुर' पन्नों पर ना तू अपनी निशानी छोड़ दे,

कह के सबसे अब खुमारी देखिएगा एक दिन।
मधुरेंद्र पाण्डे



हमने भी कश्तियों को तूफां में उतारा है,

ऐ मौज समंदर का सीना भी हमारी है।


क्या ख़ाक लुत्फ लेंगे साहिल के तमाशाई,

जिसने हर इक लम्हा, डर डर के गुज़ारा है।


देखेंगे आज हम भी तेवर तलातुम के,

कह देंगे बाज़ुओं में ये ज़ोर हमारा है।


अब क्या कहेंगे बातें, तुमसे 'मधुर' बताएं,

जब दर्द बढ़ चला है, टूटा ये किनारा है।