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उम्र जब अधपकी सी अमिया थी थोड़ी खट्टी सी थोड़ी मिट्ठी सी.. बस उसी वक्त मैंने फागुन में हाथ में ले के गुलाबी गुलाल तुम्हारे चेहरे पे हौले मल दिया था यूं कहके यूं 'धत्त' मुस्कराईं थीं मुझको जन्नत यूं नज़र आई थी हो गए होंगे कुछ पचीस बरस अब तो यादों से भी मिटा हूं मैं तब से फागुन उदास रहता है गुलाबी अब गुलाल होता नहीं ना ही वो 'धत्त' सुना फिर मैनें तुम इस जहां में हो..या दूर कहीं ? क्या तुम्हें अब भी वही आदत है 'धत्त' कहने की...भाग जाने की....

दोस्ती के नाम...इक पैग़ाम..उस दोस्त के लिए जिसके साथ चलते हुए आज 28 जनवरी को तीन साल हो गए

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आज से तीन बरस पहले तक तन्हा-तन्हा था अपनी दुनिया में तुमने चुपके से मेरे हाथों पे अपने होने की लकीरें खींची तब से हर सिम्त धनक दिखता है बिखरे हैं रंग हज़ारों हमारी दुनिया में.. जब से तुम आई हो मैं ख़्वाब बुनना सीख गया सीखा मैंने भी हुनर लफ्ज़ का जो सीख सका सीखीं तस्वीरें बनानी मैंने दरमियां टेढ़े-मेढ़े रिश्तों के मेरा उन्वान हो और मेरा तखल्लुस तुम हो तुमसे ही मैं हूं... तुम्हारे सिवा मैं कुछ भी नहीं...

नामर्द

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एक औरत ने ही जना तुमको चाहती गर ना तुम्हें तुम ना खोल पाते आंखें एक औरत ने ही जना तुमको उसको ये क्या पता था मर्द के नाम पे नामर्द जना तुम्हारी आंखों में ठहरी है हवस की आंंधी तुमने नोचा था अपने हाथों एक मासूम सी लड़की का बदन और फिर तेज़ धार चाकू से वार-पर-वार किए जाते रहे लहू गवाही दे रहा है सब, सोचो तो सिर्फ इस तरफ सोचो आज से 20-30 साल पहले एक मासूम सी लड़की की जगह तुम्हारी मां होती..... टूट जाती तुम्हारी भी हिम्मत तुम भी बच जाते इन गुनाहों से पर अफसोस तुम इंसान तो निकले ही नहीं एक नामर्द हो...नामर्द ही मरोगे तुम

तुम होतीं तो ऐसा होता...

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दीप पर्व पर तुम होतीं तो, जगमग ये दीवाली होती, मेरे आंगन में रहती तो, हर मुस्कान निराली होती। नियति का ये चक्र अनोखा, मुझको हर धोखे पर धोखा, तुमको खोया तब जाना है, क्यूं आखों ने आंसू सोखा। एक बार सपनों में आती, हर दिन रात दिवाली होती। हर आंसू से दिया जलाऊं, हर पीड़ा से गीत रचाऊं, मां मेरे जीवन के मग में, तुम आओ मैं दीप जलाऊं। जाने ही किस लोक गई तुम, अब बेकार दिवाली होती। दीप पर्व पर तुम होतीं तो, जगमग ये दीवाली होती।

दो बरस ज़िंदगी के...

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दो बरस ज़िंदगी के दामन में कितने बेहतर रहे हसीन रहे वक्त का कुछ पता चला ही नहीं मेरी आंखों के अधूरे सपने तुम्हारी आंख के कासिद निकले मेरी हर सोच मुकम्मल तुमसे मेरी हसरत को अब तो पर निकले ज़िंदगी इतनी तो आसां ना थी शुक्र कि तुम ही रहनुमां निकले..

मोहब्बत चीज़ क्या है...

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इबादत..इब्तिदा...इल्ज़ाम या रब, मोहब्बत में जमाख़ोरी है या रब। बहुत ही मुख्तलिफ़ अंदाज़ अपना, ना अपना कोई, बेगाना है या रब। अभी भी ढूंढते हैं उसको अक्सर, मिला था ख़्वाब में हौले से या रब। मिलावट इश्क में हरगिज नहीं की, वो मुझसे रूठ कर बैठा है या रब। मनाने, रुठने में क्या मुनासिब, जो मेरा था, वो अब है ग़ैर या रब। 'मधुर' की आंख में ठहरा समंदर, उसे अब चांद की हो दीद या रब।

माज़ी...

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आरजू लम्हों की बेरंग किताब, जुस्तजू सांसों का उल्टा हिसाब, ज़िंदगी इब्तिदा थी ख्वाबों की, मौत थी असलियत का हिजाब। ****** मौत से जब भी कभी डर सा लगा है दोस्तों, कब्र अपनी नाप के हर रोज़ आ जाता हूं मैं। ****** दर्द के दश्त में बेजान सा चेहरा लेकर, कौन घर में मेरे आया मेरा चेहरा लेकर। ****** मैं हज़ारों बार खुशियों के बाज़ारों में बिका, दर्द के बेजान बुत पर और बोली मत लगा। ऐ सबा हालात पर मेरे अभी ना मुस्करा, मैं बहुत टूटा हूं..दिल पर और नश्तर मत लगा। ****** मैं संबंधों की छाया में हां अक्सर यूं ही छला गया, दे स्नेह निमंत्रण थोड़ा सा हर दीप मुझे ही जला गया। ****** तमाम उम्र हादसों के शहर में गुज़री, कहीं पे उनके फ़साने हों ज़रूरी तो नहीं। ****** यूं पलट कर मुस्करा देना वो बार-बार, मर जाएंगे, इतना बता मरना है कितनी बार। ****** आंसू के आबरू की कैसे करें हिफाज़त, वो ही खुशी या ग़म में बेघर हुआ हमेशा।