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हर लोक में..एक सच

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देख दर्पण तिमिर फूट कर रो पड़ा, और बोला दबे स्वर में ये क्या हुआ, मैंने क्या कुछ ना समझा था खुद को मगर, एक मैं था विवश कांच में खो पड़ा। रो पड़ी वेदन अश्रु बन कर तभी, घाव सब खुल गए चीर करके वसन, देखते-देखते क्या से क्या हो गया, हिचकियां ले के सांसों ने मांगा कफ़न। एक कोने में मैं मौन साधक बना, पहले मन में हंसा और फिर रो पड़ा। जैसे पागल बना विश्व फिरता रहा, पत्थरों को भी छोड़ा नहीं भूल से, हर जगह सिर झुका करके पूजन किया, खुश किया देवता को कभी फूल से। किन्तु अपनी विवशता पे वो देवता, दम्भ झूठा सजाए हुए रो पड़ा। जब कभी धूप आंगन में उतरी नहीं, बदलियां झूम कर छायीं आकाश में, और उन्मुक्त जीवन का प्रतिबिम्ब बन, प्रेम की चाह उतरी हर इस सांस में। एक कोने में मैं दीप बनकर प्रिये, खुद जलाकर शलभ फूट कर रो पड़ा। यूं हृदय में कोई पीर उठती नहीं, किन्तु पीड़ा समेटे हुए जब गगन, यूं फफक रो पड़ा बीच आषाढ़ में, और सांसे लिए रोक,ठिठका पवन, मैं ‘ मधुर ’ अनकहा दर्द सहते हुए, हिचकियां ले के स्तब्ध सा रो पड़ा।

अधूरे रिश्ते या अधूरी बातें

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रिश्तों में अधूरापन जैसा कुछ हो नहीं सकता अधूरा है अगर कुछ भी तो बातें हैं, बहुत सी अनकही ऐसी जो लब पे आते-आते ही सहम कर के, ठिठक कर अपनी सांसें रोक लेती हैं ये वो बातें हैं जो माकूल रिश्ते को अधूरा छोड़ जाती हैं

मोहब्बत से आगे..कुछ औऱ..

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मोहब्बत बात करती है मेरी तन्हाईयों में, हमारे साथ रहती हैं कि हर रुसवाइयों में। बहुत से ख्वाब उनींदें बहुत अलसाई सी रातें, बहुत से रतजगे थे और अधूरी सी रही बातें, थे कुछ यूं अनकहे पैगाम उन अंगड़ाइयों में। बहुत बिगड़ा रहा मौसम बहुत सी आंधियां आई, बहुत से रास्ते भटके कि जब भी हिचकियां आई, अभी भी हसरतें शामिल उन्हीं परछाइयों में। बहुत थी बेकरारी भी बहुत से दिल में अफसाने, बहुत थी बेखुदी भी छलके थे आंखों के पैमाने, हज़ारों जुगनुओं ने भी छला बर्बादियों में।

इक सवाल..

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वो इक सवाल जो सदियों से कैद सीने में वो इक जवाब जो लम्हों के उस सफीने में बहुत दिनों से इक ख्याल बहुत गुमसुम है वो बेमज़ा सा सुलगता है मेरे सीने में। ना आरजू ना कोई दर्द स्याह रातों में ना हसरतें ना जुस्तजू बची हैं आखों में फकत चुनिंदा ख्वाब के वो नुकीले टुकड़े लहूलुहान कर रहे हैं उन्हीं सांसों में मैं बेइरादा,बेसबब सा उसी साहिल पर, वो ढूंढता हूं जो खो आया था सफीने में। वही मिजाज़ वही दर्द वही अफसाने वही ख्याल जो हसरत से मिला अनजाने जो जिक्र उसके तग़ाफुल सामने आया उलझते ही गए रिश्ते थे हमको सुलझाने मैं बेकरार मुसाफिर सा उन्हीं रिश्तों में तलाशता हूं सबब जो नहीं है जीने में।

एक गुल्लक ज़िंदगी...

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आज फिर एक दिन का खर्चा है आज फिर एक नोट कम होगा। ज़िंदगी की सुनहरी गुल्लक से खाली से दिन का बोझ कम होगा। ऐसे खर्चे है रोज दिन का नोट हाथों से बस फिसल गया जैसे। आदतन खूब संभाला उसको, वक्त का नोट उड़ गया जैसे। फिर से गुल्लक को लेके हाथों उम्र का वजन तौलना होगा। नोट तो रोज़ खर्च होता है बदले में मिल गए मुझे चिल्लर शाम को घर पे अपनी गुल्लक में डाल देता हूं यादों के चिल्लर और मैं देखता हूं गुल्लक को आज तो कुछ वजन बढ़ा होगा। ऐसा ही एक वक्त आएगा नोट सारे ही खर्च होंगे जब, सिर्फ यादों के ढेर से सिक्के मेरी गुल्लक में ही रहेंगे तब खूब खनकाउंगा मैं वो गुल्लक उससे सांसों का बोझ कम होगा। सारे नोटों के खर्च होने पर सिक्को से भर चुकी हुई गुल्लक। वक्त की बेरहम सी ठोकर पर फूट जाएगी सुनहरी गुल्लक। सारे चिल्लर बिखर से जाएंगे दोस्तों को भी तजुर्बा होगा। फूटते ही सुनहरी गुल्लक के लोग लूटेगें उसकी कुछ बातें, कुछ की आंखों से अश्क छलकेंगे कुछ के दिल को मिलेगी सौगातें। एक गुल्लक मिलेगी मिट्टी में सबके हाथों में कुछ ...
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ज़िंदगी सुबह सुबह अलसाई किरणें जब मेरे घर में आती हैं, सुबह सुबह कुछ सपने लेकर आंखों से नींदे जाती हैं तभी एक आहट सी दिल में बेचैनी सी भर देती है. मोबाइल पर तुमसे बातें आशाओं को पर देती है मरूथल के तपते दामन पर बारिश की बूंदे आती हैं। सुबह सुबह आवाज़ तुम्हारी बेसुध को सुध कर जाती है अलसाई आवाज़ जादुई, जाने क्या क्या कर जाती है नई उमंगे अवचेतन पर चेतन का रस बरसाती हैं। एक अधूरापन सांसों का रहा अपरिमित भी कितना हो और नयन की बोझिलता में जीवन प्रश्न बड़ा कितना हो, किन्तु सवेरे तुमसे बातें जीवन में रस भर जाती हैं। प्रेम, सहजता की परिभाषा आवाज़ों से छन कर आता आधी ख़्वाहिश का पूरापन अपनेपन की प्यास बुझाता, मन में इठलाती सी लहरें सागर के तट को पाती हैं। 

अरमान

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कभी एहसास के दामन को आंसू से भिगो देना कभी हसरत की मिट्टी में सुनहरे ख्वाब बो देना। मैं चाहत की चमकती राह पर सदियों से तन्हा हूं कभी फुरसत में मेरे ख्वाब को इक आसमां देना। समंदर पूछता रहता है मुझसे तेरी बातों को ये लहरें छू के मुझको पूछती हैं तेरी यादों को मैं क्या कह दूं चरागों की तरह ख़ामोश बैठा हूं मैं कैसे खोल दूं दिल की मोहब्बत के लिफाफों को समंदर के किनारे पर बिछा मैं रेत का बिस्तर कभी जब दिल करे इस पर कोई सिलवट सजा देना। कभी एहसास के दामन को आंसू से भिगो देना कभी हसरत की मिट्टी में सुनहरे ख्वाब बो देना।     मुझे तो चांद या तारे कभी अच्छे नहीं लगते मुझे ये झिलमिलाते रात में जुगनू नहीं जंचते मैं क्या मांगूं ख़ुदा से सोचता रहता हूं रातों को मेरे ख़्वाबों के दामन में तेरे ही अक्स हैं सजते हूं मैं इक फूल जो अपने ही कांटों से हुआ घायल फकत शबनम की ख्वाहिश है, अगर जो हो सके देना।   कभी एहसास के दामन को आंसू से भिगो देना कभी हसरत की मिट्टी में सुनहरे ख्वाब बो देना...