Posts

प्रेम

Image
आपको सोच के बस सोचता रहता है दिल, आपकी बात पे रुक रुक के धड़कता है दिल, बात शबनम की है छूते बिगड़ ना जाए, आपको देख कर बस देखता रहता है दिल । 

दर्द

Image
दर्द से गुफ्तगूं करने बैठा, मैं ज़हर आग का पीने बैठा। आज बादल भी फूटकर रोए, दर्द की ख़ाक पे पहरा बैठा। आसुओं अपनी हिफाज़त कर लो, मैं हूं माज़ी के गांव में बैठा। आज की रात रतजगा होगा, एक जुगनू हथेली पर बैठा।

साझा बातें

प्रिय मित्रों एक अरसे बाद दोबारा अपने पी सी को छू रहा हूं..सो पहला काम ये कि आपसे मुखातिब हो लिया जाए, बीमार था और कायदे से बीमार था..लिहाजा़ आप सभी से दूर रहा, लेकिन आप सभी की दुआओं ने मुझे स्वस्थ किया और आज में मैं फिर आपके साथ हूं, मेरी रचनाओं से अपना स्नेह बनाए रखिएगा, यही गुजारिश है आपका मधुरेंद्र मोहन

प्रतीक्षा

Image
तुम मुझे मुड़ कर कहो तो एक दिन, पास आकर के बता दो एक दिन, मैं तुम्हारी आस में ठहरा हुआ हूं, झील में पत्थर तो फेंको एक दिन। मैं ना जानूं मैं ना समझूं क्या करु मैं, नैन से नैनों की भाषा क्या पढ़ूं मैं, मैं तुम्हारे हृदय की क्या थाह लूंगा, मैं तो दीवाना हूं तुमको चाह लूंगा, किन्तु ना इतने बनो अनजान तुम, प्रेम को आकाश दे दो एक दिन। एक गाथा प्रेम की मैं लिख रहा हूं, किन्तु अभिव्यक्ति में सकुचा दिख रहा हूं, पर मेरी हर कल्पना में सिर्फ तुम हो, ओस हूं बस धूप में मैं बिक रहा हूं। तुम मुझे इक बार होठों से लगा कर, नेह को अभिमान दे दो एक दिन। पुष्प सा सुंदर नहीं हूं जान लो तुम, मैं सुगंधित भी नहीं हूं मान लो तुम, प्रेम में मुझ सा सहज कोई नहीं है, जानना हो इस जगत को छान लो तुम। प्रेम का परिमाण तुमको क्या बताऊं, हृदय के पथ पर चलो तो एक दिन।

तुम्हारी कल्पना में

Image
इस तरह मुड़कर ना देखो प्रिय मुझे तुम, आंख के सागर में ना हो जाऊं मैं गुम । कल्पना है या मेरी छोटी सी आशा, हृदय पत्रों पर उभरती प्रेम भाषा, प्रेयसि इस बार कुछ खुल करके बोलो, प्रेम कोंपल को ना घेरे अब निराशा। हृदय के तारों के मेरे सुर सभी तुम, इस तरह मुड़कर ना देखो प्रिय मुझे तुम। नेह को स्पर्श की होती है चाहत , हृदय स्पंदन भी लगती तेरी आहट, रुठ कर कब से गई है मेरी निद्रा, सोचता हूं स्वप्न ना हो जाएं आहत। सोचता तुमको मै जब हो जाता गुमसुम, इस तरह मुड़कर ना देखो प्रिय मुझे तुम।

प्रिय के नाम

Image
देखो प्रिय तुम्हारे आंसू , मेरी आंखों से झरते हैं । ये कैसा पावन परिचय है, हृदय-हृदय से जब मिलते हैं ये उन्माद नहीं है कोई, प्रेम सुधा का प्रखर चरम है , यह मेरी अनुरक्ति भी नहीं , नयनों का ये नहीं भरम है। तुम मेरे आंगन तो आओ, स्नेह दीप अब भी जलते हैं। देखो प्रिय तुम्हारे आंसू... तुमको पाकर जग पाया तो , आकुलता अब शेष नहीं है, नयन बंद कर तुमको देखा, स्वप्नों का कोई देश नहीं है। तुम मेरे दृग में आए हो हृदय पुष्प मेरे खिलते हैं। देखो प्रिय तुम्हारे आंसू... ऐसा नहीं कि तुमसा कोई , सकल विश्व में कोई नहीं है, किन्तु मेरे एकांत का यौवन , आंसू का सुर और नहीं है। तुम पीड़ा में प्रेम उगाओ, मेरे कंठ गीत फबते हैं । देखो प्रिय तुम्हारे आंसू.. मेरी आंखों से झरते हैं

मित्र, जो चला गया

Image
आज सुबह सूर्य ने फिर आंख खोली, और भर दी रौशनी से जग की झोली, किन्तु कुछ जगहों पर पसरा है अंधेरा, दीप के शव पर ना सूरज खेल होली । हां बहुत उन्मुक्त से दिखते हो दिनकर, मृत्यु पर दीपक के तुम रोओ भी क्यूं कर, भोर में शव साधना अच्छी नहीं है, क्षोभ ऐसा कि हुए जाते हो जर्जर । किन्तु कुछ जगहों पर पसरा है अंधेरा, दीप के शव पर ना सूरज खेल होली । सूर्य तुम भी खुश नहीं हो जो हुआ है, आंख की कोरों को लाली ने छुआ है, सच कहो षडयंत्र में शामिल नहीं थे, या कि बुझते दीप पर अब दुख हुआ है। किन्तु कुछ जगहों पर पसरा है अंधेरा, दीप के शव पर ना सूरज खेल होली ।