मधुरेंद्र पाण्डे





ये कैसा सिलसिला है,ख़त्म जो नहीं होता,

यूं दिल से ख़्वाब का लंबा सफ़र नहीं होता ।


तमाम दिन, तमाम रात और ये बेचैनी,

क्यूं तेरी याद में आंसू का पर नहीं होता ।


अजीब शख़्स हूं, आंखों में सिर्फ सन्नाटा,

ना कोई शोर, कोई चाप अब नहीं होता ।


शहर में भीड़, भीड़ में शिकस्त से चेहरे,

ये जिस्म-ओ-रुह में एहसास क्यों नहीं होता।


ये प्यास, प्यास उम्र भर की हो गई शायद,

अब तो दरिया का भी कोई असर नहीं होता ।


तेरा ख़्याल है, दिन-रात घेरे रहता है,

मैं अपने घर में भी तन्हा कभी नहीं होता।