मधुरेंद्र पाण्डे


इस तरह मुड़कर ना देखो प्रिय मुझे तुम,


आंख के सागर में ना हो जाऊं मैं गुम ।




कल्पना है या मेरी छोटी सी आशा,


हृदय पत्रों पर उभरती प्रेम भाषा,


प्रेयसि इस बार कुछ खुल करके बोलो,


प्रेम कोंपल को ना घेरे अब निराशा।




हृदय के तारों के मेरे सुर सभी तुम,


इस तरह मुड़कर ना देखो प्रिय मुझे तुम।




नेह को स्पर्श की होती है चाहत ,


हृदय स्पंदन भी लगती तेरी आहट,


रुठ कर कब से गई है मेरी निद्रा,


सोचता हूं स्वप्न ना हो जाएं आहत।




सोचता तुमको मै जब हो जाता गुमसुम,


इस तरह मुड़कर ना देखो प्रिय मुझे तुम।








मधुरेंद्र पाण्डे



देखो प्रिय तुम्हारे आंसू ,

मेरी आंखों से झरते हैं ।

ये कैसा पावन परिचय है,

हृदय-हृदय से जब मिलते हैं



ये उन्माद नहीं है कोई,

प्रेम सुधा का प्रखर चरम है,

यह मेरी अनुरक्ति भी नहीं,

नयनों का ये नहीं भरम है।


तुम मेरे आंगन तो आओ,

स्नेह दीप अब भी जलते हैं।


देखो प्रिय तुम्हारे आंसू...


तुमको पाकर जग पाया तो,

आकुलता अब शेष नहीं है,

नयन बंद कर तुमको देखा,

स्वप्नों का कोई देश नहीं है।


तुम मेरे दृग में आए हो

हृदय पुष्प मेरे खिलते हैं।


देखो प्रिय तुम्हारे आंसू...


ऐसा नहीं कि तुमसा कोई,

सकल विश्व में कोई नहीं है,

किन्तु मेरे एकांत का यौवन,

आंसू का सुर और नहीं है।


तुम पीड़ा में प्रेम उगाओ,

मेरे कंठ गीत फबते हैं ।


देखो प्रिय तुम्हारे आंसू..

मेरी आंखों से झरते हैं
मधुरेंद्र पाण्डे


आज सुबह सूर्य ने फिर आंख खोली,

और भर दी रौशनी से जग की झोली,

किन्तु कुछ जगहों पर पसरा है अंधेरा,

दीप के शव पर ना सूरज खेल होली ।



हां बहुत उन्मुक्त से दिखते हो दिनकर,

मृत्यु पर दीपक के तुम रोओ भी क्यूं कर,

भोर में शव साधना अच्छी नहीं है,

क्षोभ ऐसा कि हुए जाते हो जर्जर ।



किन्तु कुछ जगहों पर पसरा है अंधेरा,

दीप के शव पर ना सूरज खेल होली ।


सूर्य तुम भी खुश नहीं हो जो हुआ है,


आंख की कोरों को लाली ने छुआ है,

सच कहो षडयंत्र में शामिल नहीं थे,

या कि बुझते दीप पर अब दुख हुआ है।



किन्तु कुछ जगहों पर पसरा है अंधेरा,

दीप के शव पर ना सूरज खेल होली ।





मधुरेंद्र पाण्डे

जब भी थक कर के,मैं दफ़्तर से घर को लौटा हूं,

और यूं सोया हूं कि मुझको कुछ पता ही नहीं

फिर भी एहसास वो हाथों की छुअन तेरे मां,

मैंने सिरहाने पर महसूस किया है तुझको ।


जब भी ऐसा लगा मेरे हाथ में अब कुछ भी नहीं

याद आता है वो दस पैसे का सिक्का मुझको,

जिससे लेता था मैं चूरन की वो मीठी गोली

पेट भर जाता है महसूस हुआ है मुझको ।


फिर भी एहसास वो हाथों की छुअन तेरे मां,

मैंने सिरहाने पर महसूस किया है तुझको ।


हर तरफ भीड़ है, आवाज़ है और दुकानें

सारी दुनिया है और फिर मैं इतना तन्हा,

मैंने बेबस सी निगाहों से आसमां को तका

तेरा आंचल है नम महसूस हुआ है मुझको ।


फिर भी एहसास वो हाथों की छुअन तेरे मां,

मैंने सिरहाने पर महसूस किया है तुझको ।


जब भी आंखों में तेरी शक्ल सी उभरी हो मेरे

मेरा गुस्सा कहीं काफूर सा हो जाता है

हर एक शख़्स के किरदार में मिलती हो मुझे

तुम हवाओं में भी महसूस हुआ है मुझको ।


फिर भी एहसास वो हाथों की छुअन तेरे मां,

मैंने सिरहाने पर महसूस किया है तुझको ।





मधुरेंद्र पाण्डे




वह अंतिम अनुभूति हृदय की,

सांस थमी सी लगी समय की,

वह स्पर्श व्याख्या ढूंढे,

उसको ढूंढे गंध मलय की ।
मधुरेंद्र पाण्डे


मौन ही जब सार्थक स्वीकृति बने,


और जीवन मृत्यु की अनुकृति बने,

तब विभा ना भेजना कुछ व्यर्थ तुम

चाहता हूं प्राण की आहुति बने ।
मधुरेंद्र पाण्डे

बेसबब था सफर बेसबब ज़िंदगी

बेसबब हर खुशी बेसबब हर हंसी

आज फिर भी ये दिल इतना इतरा रहा

बात थोड़ी सी है मिल गई जिंदगी


तुम मिले और मैं ख्वाब बुनने लगा

बेसबब ख़ार रस्तों के चुनने लगा

तुम मिले और ख्वाबों में रंग भर गए

और मैं बात सबकी ही सुनने लगा


क्या यही प्यार है

तू बता जिंदगी।


तू ना माने ना माने तो क्या बात है

आज हर ख्वाब ही एक परवाज़ है

ऐ खुदा अप्सराएं तो होंगी बहुत

पर मेरा यार औरों से कुछ खास है


क्या यही प्यार है

तू बता ज़िंदगी ।

मधुरेंद्र पाण्डे


मैं तुम्हें चाहता बहुत हूं मगर,

और मैं कह ना सका कुछ तुमसे

तुम ही समझो तो बात अच्छी है

मेरे चेहरे पर नूर है तुमसे


मेरे अंतर की सारी सारी व्यथा

पलकों पर आ नहीं सकी फिर भी

तुमको देखा तो देखता ही रहा

दर्द के साथ ही दवा तुमसे


मैं तुम्हें चाहता बहुत हूं मगर,

और मैं कह ना सका कुछ तुमसे ।


लोग कहते हैं कदम ठिठके हैं

लोग नांदां हैं लोग क्या समझें

मैंने जिस दिन नहीं देखा तुमको

सांस दुश्वार ख्वाब थी हमसे


मैं तुम्हें चाहता बहुत हूं मगर,

और मैं कह ना सका कुछ तुमसे ।


मैंने देखी तेरी मासूम हंसी

होंठ पर कोई लहर उठती सी

मेरे सीने में कोई ख्वाब जगा

एक अलसाई किरण है तुमसे


मैं तुम्हें चाहता बहुत हूं मगर,

और मैं कह ना सका कुछ तुमसे ।


आज की बात चलो हो जाए

चांद बादल में कहीं खो जाए

मैं तुम्हें जी लूं पूर्णिमा की तरह

सारी ही चांदनी रहे तुमसे


मैं तुम्हें चाहता बहुत हूं मगर,

और मैं कह ना सका कुछ तुमसे ।


तुमको चाहा तो टूटकर चाहा

मैं निहां हो गया हूं ख्वाबों में

मेरी आंखो में टिमटिमाती खुशी

हर खुशी का सुरूर है तुमसे


मैं तुम्हें चाहता बहुत हूं मगर,

और मैं कह ना सका कुछ तुमसे ।


मैं कहूं या ना कहूं है मुश्किल

तुमको मैं खो के जी नहीं सकता

सोचता हूं कि बुरा मानोगी

एक ख़ामोशी मुसलसल तुमसे


मैं तुम्हें चाहता बहुत हूं मगर,

और मैं कह ना सका कुछ तुमसे ।

मधुरेंद्र पाण्डे


एक बार प्रिय तुम मिल जाओ

सारी धरा कंवल हो जाए

एक बार प्रिय हाथ थाम लो

अविकल गगन विकल हो जाए


तुम से ही यह सांझ बावरी

तुम से ही यह रैन निर्झरी

तुम ही तुम हो सिर्फ धनुक में

तुम कोयल की कुहुक सांवरी


एक बार जो मुड़ कर देखो

सारा स्वप्न असल हो जाए


तुम हो बस पलकों की भाषा

आंखों के काजल की आशा

तेरा रुप या धूप है निखरी

तुम देवों की हो परिभाषा


तुम जो मेरी हो जाओ तो

जीवन एक पहल हो जाए



सांसों की आवृत्ति तुम्हीं हो

मौन जहां हो मुखर वहीं हो

तुम कलिका के पोर पोर में

भोर सुनहरी सिर्फ तुम्हीं हो


तुम जो आंचल लहरा दो तो

सौम्य समुद्र अबल हो जाए

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