अभिलाषा



मौन ही जब सार्थक स्वीकृति बने,


और जीवन मृत्यु की अनुकृति बने,

तब विभा ना भेजना कुछ व्यर्थ तुम

चाहता हूं प्राण की आहुति बने ।

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