मधुरेंद्र पाण्डे


चाक पर चाक होती रही ज़िंदगी
रौशनी को तरसती रही ज़िंदगी।

कितने दीपक तराशे इन्हीं हाथ से,
कितने सपने बुने थे इसी चाक से,
गोल पृथ्वी सा ये चाक चलता रहा,
गुम हुई हर लकीरें सभी हाथ से,

चाक है गोल और गोल हैं रोटियां
फिर भी भूखी तड़पती रही ज़िंदगी।

अब के रम्मो की गुड़िया का वादा भी है
और बड़कू को देना पटाखा भी है
इस दिवाली पे अम्मा की साड़ी नई
और बीवी का लाना परांदा भी है,

पर पसीने की कीमत कहां कोई दे
बेवजह ख्वाब बुनती रही ज़िंदगी।

हां उजाले की खातिर अंधेरा लिए
आंख में झिलमिलाता सवेरा लिए
चाक यूं ही लगातार चलता रहा
सीने पर उंगलियों का बसेरा लिए

ख्वाब पलते रहे, ख्वाब मरते रहे,
सांस दर सांस पिसती रही ज़िंदगी।