दो बरस ज़िंदगी के...




दो बरस ज़िंदगी के दामन में


कितने बेहतर रहे हसीन रहे

वक्त का कुछ पता चला ही नहीं

मेरी आंखों के अधूरे सपने

तुम्हारी आंख के कासिद निकले

मेरी हर सोच मुकम्मल तुमसे

मेरी हसरत को अब तो पर निकले

ज़िंदगी इतनी तो आसां ना थी

शुक्र कि तुम ही रहनुमां निकले..

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