माज़ी...





आरजू लम्हों की बेरंग किताब,

जुस्तजू सांसों का उल्टा हिसाब,

ज़िंदगी इब्तिदा थी ख्वाबों की,

मौत थी असलियत का हिजाब।



******



मौत से जब भी कभी डर सा लगा है दोस्तों,

कब्र अपनी नाप के हर रोज़ आ जाता हूं मैं।



******



दर्द के दश्त में बेजान सा चेहरा लेकर,

कौन घर में मेरे आया मेरा चेहरा लेकर।



******


मैं हज़ारों बार खुशियों के बाज़ारों में बिका,

दर्द के बेजान बुत पर और बोली मत लगा।


ऐ सबा हालात पर मेरे अभी ना मुस्करा,

मैं बहुत टूटा हूं..दिल पर और नश्तर मत लगा।



******



मैं संबंधों की छाया में हां अक्सर यूं ही छला गया,

दे स्नेह निमंत्रण थोड़ा सा हर दीप मुझे ही जला गया।



******



तमाम उम्र हादसों के शहर में गुज़री,

कहीं पे उनके फ़साने हों ज़रूरी तो नहीं।



******



यूं पलट कर मुस्करा देना वो बार-बार,

मर जाएंगे, इतना बता मरना है कितनी बार।



******



आंसू के आबरू की कैसे करें हिफाज़त,

वो ही खुशी या ग़म में बेघर हुआ हमेशा।

Comments

Popular posts from this blog

घायल शब्द

तुम्हारे नाम की स्याही

सिलवटें