मधुरेंद्र पाण्डे



उम्र की धूप खिल चुकी है अब

जीना जीना वो उतरी आंगन में

थोड़ी ही देर जवानी अब तो

शाम आगाज़ करने वाली है

धूप की जगह छांव ले लेगी

छांव की जगह अंधेरा होगा

उस अंधेरे में अनबुझी हसरत

जुगनू की तरह टिमटिमाएगी

चाहने वाले दिलासा देंगे

ये भी बोलेंगे कि ये हसरतें

अब उनकी हैं

मैं अंधेरे में कहीं दूर निकल जाऊंगा

हसरतें जुगनू से बदलेंगी लिबास

फिर जगह लेंगी सितारों की तरह

आंसू बन कर वो सितारे हरदम

आंख में उसकी झिलमाएंगे


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