मधुरेंद्र पाण्डे



तुम नदी हो

मुझे पता था कि इठलाओगी

कभी कभी यूं अकेले मे ही बलखाओगी

खुद से फुरसत मिले, समझ लेना

मुकद्दर क्या है..जान जाओगी

मैं समंदर ही सही खारा सा

मेरे सीने से लिपट जाओगी

जाओ बेफिक्र रहो

मेरे इंतज़ार से अब

मैं तुम्हारा था

तुम्हारा हूं

चाहे बीते कितने भी बरस
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