मधुरेंद्र पाण्डे



मौन ही जब सार्थक स्वीकृति बने

और जीवन, मृत्यु की अनुकृति बने..

तब विभा ना भेजना कुछ व्यर्थ तुम..

चाहता हूं प्राण की आहुति बने..
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