मधुरेंद्र पाण्डे



एक औरत ने ही जना तुमको

चाहती गर ना तुम्हें

तुम ना खोल पाते आंखें

एक औरत ने ही जना तुमको

उसको ये क्या पता था

मर्द के नाम पे नामर्द जना

तुम्हारी आंखों में ठहरी है हवस की आंंधी

तुमने नोचा था अपने हाथों

एक मासूम सी लड़की का बदन

और फिर तेज़ धार चाकू से

वार-पर-वार किए जाते रहे

लहू गवाही दे रहा है सब,

सोचो तो सिर्फ इस तरफ सोचो

आज से 20-30 साल पहले

एक मासूम सी लड़की की जगह

तुम्हारी मां होती.....

टूट जाती तुम्हारी भी हिम्मत

तुम भी बच जाते इन गुनाहों से

पर अफसोस तुम इंसान तो निकले ही नहीं

एक नामर्द हो...नामर्द ही मरोगे तुम


मधुरेंद्र पाण्डे




दीप पर्व पर तुम होतीं तो,


जगमग ये दीवाली होती,

मेरे आंगन में रहती तो,

हर मुस्कान निराली होती।





नियति का ये चक्र अनोखा,

मुझको हर धोखे पर धोखा,

तुमको खोया तब जाना है,

क्यूं आखों ने आंसू सोखा।



एक बार सपनों में आती,

हर दिन रात दिवाली होती।



हर आंसू से दिया जलाऊं,

हर पीड़ा से गीत रचाऊं,

मां मेरे जीवन के मग में,

तुम आओ मैं दीप जलाऊं।



जाने ही किस लोक गई तुम,

अब बेकार दिवाली होती।



दीप पर्व पर तुम होतीं तो,

जगमग ये दीवाली होती।
मधुरेंद्र पाण्डे



दो बरस ज़िंदगी के दामन में


कितने बेहतर रहे हसीन रहे

वक्त का कुछ पता चला ही नहीं

मेरी आंखों के अधूरे सपने

तुम्हारी आंख के कासिद निकले

मेरी हर सोच मुकम्मल तुमसे

मेरी हसरत को अब तो पर निकले

ज़िंदगी इतनी तो आसां ना थी

शुक्र कि तुम ही रहनुमां निकले..
मधुरेंद्र पाण्डे




इबादत..इब्तिदा...इल्ज़ाम या रब,

मोहब्बत में जमाख़ोरी है या रब।


बहुत ही मुख्तलिफ़ अंदाज़ अपना,

ना अपना कोई, बेगाना है या रब।


अभी भी ढूंढते हैं उसको अक्सर,

मिला था ख़्वाब में हौले से या रब।


मिलावट इश्क में हरगिज नहीं की,

वो मुझसे रूठ कर बैठा है या रब।


मनाने, रुठने में क्या मुनासिब,

जो मेरा था, वो अब है ग़ैर या रब।


'मधुर' की आंख में ठहरा समंदर,

उसे अब चांद की हो दीद या रब।
मधुरेंद्र पाण्डे




आरजू लम्हों की बेरंग किताब,

जुस्तजू सांसों का उल्टा हिसाब,

ज़िंदगी इब्तिदा थी ख्वाबों की,

मौत थी असलियत का हिजाब।



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मौत से जब भी कभी डर सा लगा है दोस्तों,

कब्र अपनी नाप के हर रोज़ आ जाता हूं मैं।



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दर्द के दश्त में बेजान सा चेहरा लेकर,

कौन घर में मेरे आया मेरा चेहरा लेकर।



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मैं हज़ारों बार खुशियों के बाज़ारों में बिका,

दर्द के बेजान बुत पर और बोली मत लगा।


ऐ सबा हालात पर मेरे अभी ना मुस्करा,

मैं बहुत टूटा हूं..दिल पर और नश्तर मत लगा।



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मैं संबंधों की छाया में हां अक्सर यूं ही छला गया,

दे स्नेह निमंत्रण थोड़ा सा हर दीप मुझे ही जला गया।



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तमाम उम्र हादसों के शहर में गुज़री,

कहीं पे उनके फ़साने हों ज़रूरी तो नहीं।



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यूं पलट कर मुस्करा देना वो बार-बार,

मर जाएंगे, इतना बता मरना है कितनी बार।



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आंसू के आबरू की कैसे करें हिफाज़त,

वो ही खुशी या ग़म में बेघर हुआ हमेशा।

मधुरेंद्र पाण्डे




तुमसे अच्छी तुम्हारी यादें हैं,


कम से कम साथ मेरे रहती हैं।


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सोचता हूं मैं कुछ कहूं खुद से,

जाने क्यूं बेक़रार सा दिल है।


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जाने क्यूं आइने ने ये पूछा,

तुम्हारे पास है बस इक चेहरा,

मैं लाजवाब रहा क्या कहता,

वक्त ने धुल दिया मेरा चेहरा।


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तुम नहीं हो तो नहीं हो फिर भी,

एक उम्मीद पे ज़िन्दा हूं मैं।



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मौत से है फासिला बस दो कदम,

ज़िंदगी बस दो कदम ही रह गई।


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मधुर चांदनी यौवन तेरा,

चंद्र बना है दर्पण तेरा,

मुझको नेह-निमंत्रण देता,

स्मृति का आलिंगन तेरा।


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हर सुबह रोज़ रात के नखरे,

नींद खुलती नहीं कभी मेरी।


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पुराने मशवरों के साथ ज़िंदगी मेरी,

एक उम्मीद पर निकलती रही।



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मोहब्बत मय नहीं तो और क्या है,

भला चंगा था दीवाना बनाया।


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आज आंखों में ख़्वाब बोएंगे,

सुबह उठ्ठेगें उजाला लेकर।


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तुम्हारे लफ़्ज़ों की चाशनी में,

ये इश्क अपना पिघल रहा है।


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हर एक शख्स मेरा इम्तिहान लेता है,

वो सांस छीन के सारे जहान लेता है।


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मेरा नसीब और तेरा वादा,

ये भरोसा भी क्या भरोसा है..?


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आरजू मुद्दतों से बाकी है,

तुझसे होनी है मुलाकात अभी।


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तुम्हारे साथ मेरी ज़िंदगी का हर लम्हा,

बहुत हसीन,बहुत गुनगुना सा लगता है।


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तुम्हारे साथ मेरी ज़िंदगी का हर लम्हा,

बहुत हसीन बहुत बेमिसाल लगता है।


तुम्हीं तो हो मेरा उन्वान,आरजू सबकुछ,

तुम्हारे प्यार का लहज़ा कमाल लगता है।


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देखिए वो किस अदा से होशियारी कर गए,

ख़त तो मुझको ही दिया, पर नाम ही डाला नहीं।
मधुरेंद्र पाण्डे




राहुल भैया सुनो हमारी,


राजनीति तलवार दुधारी,

काट लिए 10 साल मौज तुम,

अब देखो जनता की बारी।


किया केजरी को फिट तुमने,

राजनीति में आया पिटने,

जनता लेगी हर हिसाब अब,

पाप किए हैं तुमने जितने।


जनता को बौड़म समझा था,

अब देखो उसकी होशियारी।


महंगाई आकाश पे धर दी,

और वादों से झोली भर दी,

ऐसे कब तक चलेगा भैया,

गैस सिलेंडर बारह कर दी।


नाकों चने चबाए हैं सब,

याद तुम्हारी कारगुज़ारी।


मेहनतकश का दर्द ना जानो,

खुद को सबसे अव्वल मानो,

ऐसे मुल्क कहां चलता है,

सच्चाई मानो ना मानो।


जनता के आंसू हैं ताक़त,

ना समझो उसको लाचारी।


खाने का अधिकार दिया है,

मनरेगा में काम दिया है,

क्या तुमसे पहले भारत में,

इस माटी ने प्राण लिया है।


तुमसे पहले भी भारत में,

भरे पेट जनता डक्कारी।


नब्ज़ नहीं भारत की समझे,

स्वप्न लोक में अपने उलझे,

ये सतरंगी देश हमारा,

हर दिक्कत जनता से सुलझे।


जाओ अपना काम करो अब,

तुम्हें मुबारक हो बेकारी।
मधुरेंद्र पाण्डे




उसने जीवन की डोर बुनी,

मन ही मन में इक बात चुनी,

जब देश की जर्जर हालत पर,

भारत मां की आवाज़ सुनी।


था युवा बहुत, थे स्वप्न बड़े,

रस्ते पथरीले और कड़े,

थी राह कठिन, असमंजस भी,

कुछ बंधन थे सामने खड़े।



लेकिन संकल्प वो अविजित था,

फिर भी नौका मझधार चुनी।


परिवार अडिग था ज़िद पर यूं,

वो नहीं समझ पाया कि क्यूं,

वो चला अकेला था पथ पर,

जीवन साथी का साथ ही क्यूं।



फिर हार के उसने हां कर दी,

उसकी हर आशा गई भुनी।



वह विवश मातृ के आगे था,

उलझा-उलझा बस तागे सा,

वो मान गया फिर परिणय पर,

जब कि विवाह से भागे था।



पर राष्ट्र प्रेम सर्वोपरि था,

जीवन साथी ने बात सुनी।



जीवन साथी था एक ओर,

था राष्ट्र प्रेम की थामे डोर,

जीवन संगिनी ने मुक्त किया,

था कष्ट बहुत पीड़ा भी घोर।



था निकल पड़ा वो मतवाला,

वो राष्ट्र धर्म का एक मुनि।



जीवन संगिनी ने जाना था,

बाधक नहीं होगी ठाना था,

वो नहीं मिले फिर बरसों से,

यूं लक्ष्य सुराज का पाना था।


दोनों के मग थे हुए अलग,

लेकिन दुनिया थी एक चुनी।



ऐसा ही एक दिवस आया,

जब उसने सबको बतलाया,

वो मेरी जीवन साथी है,

उसने जो खोया था पाया।



वो भारत मां की थाती थी, 

जो राष्ट्र धर्म की राह चुनी।



यौवन तो बीत गया था जब,

पर अन्तर्मन संतुष्ट था अब,

इस देश का हर बच्चा-बच्चा,

लगता था उसके लाल हैं सब।



अपने परिवार को तज करके,

भारती की चूनर उसने बुनी।